Wednesday, July 9, 2008
असली मुद्दे जाएं भाड़ में
देश में एटमी करार को लेकर कोहराम मचा है। नम्बरों का खेल चल रहा है। सरकार बचेगी या गिरेगी। आम जनमानस भी यही पूछ रहा है कि किस पार्टी के कितने सांसद हैं। सरकार बचाने के लिए कितने चाहिए। सपा में टूट होगी या नहीं। भाजपा वाले क्या दांव खेल रहे हैं। हरियाणा में भाजपा इनैलो के साथ जाएगी या हजकां के साथ। पूरा देश उपरोक्त सवालों में उलझ गया है और हमारे देश के राजनेता खुश हैं क्योकिं वह यही तो चाहते थे कि राजनेताओं का पहला मकसद यह है कि देश का ध्यान मूल मुद्दों से भटके। मतदाता ही हिस्सों में बंट जाए। राजनेताओं की चाल है कि मतदाता या तो एटमी करार के हक में वोट डाले या विरोध में। असली मुद्दे जाएं भाड़ में। देश की मूल समस्याएं महंगाई, बेरोजगारी, घोटाले, कानून व्यवस्था, सब कुछ हाशिए में चला गया है। सभी टीवी चैनल, अखबार, रेडियो एक ही खबर दिखा रहे हैं कि एटमी करार पर दिल्ली में क्या गतिविधियां चल रही हैं। महंगाई की मार से त्रस्त मतदाता भी सबकुछ भूल कर एटमी करार की राजनीति देखने में उत्सुक है। राजनीति का बेशर्मीपन व नंगापान इससे बढ़कर और क्या हो सकता है कि ब् वर्ष तक कांग्रेस को कोसने वाली समाजवार्टी पार्टी ने कथित देशहित के नाम पर कांग्रेस को समर्थन दिया है। सपा को पता है कि यदि आज लोकसभा के चुनाव हो जाते हैं तो ‘हाथी’ साइकिल को कुचल डालेगा। वहीं चार वर्षों तक मलाई खाकर वामपंथी दल केवल अमेरिका विरोधी पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर समर्थन वापिस ले लेते हैं। वामपंथी उस वक्त कहां थे जब महंगाई 11 फीसदी का आंकड़ा पार कर गई थी। देश ने इतनी महंगाई, कालाबाजारी पहले कभी नहीं देखी। वस्तुओं के दाम सुबह कुछ और और शाम को कुछ हुए हैं। नेताओं ने सीमेंट, लोहा, चीनी उद्योगों से जिस तरह से जेबें भर कर देश के आम गरीबों को पीसा है, वह मुद्दा अब एटमी करार में दबता नजर आ रहा है। एटमी करार होना चाहिए या नहीं, यह बहस का मुद्दा हो सकता है लेकिन देश की जनता को अपनी जिंदगी केवल इसी मुद्दे पर ही नहीं टिकानी है। मतदाता को अपने असली मुद्दे हर हाल में याद रखने होंगे। मतदाता को राजनीतिक चाल से बचना होगा।