‘आज के हालात में देखा गया, हर कोई सदमात में देखा गया।
सब है लेकिन सब्र बिल्कुल नहीं, आदमी की ज़ात में देखा गया,
बेसबब अक्सर मरी इंसानियत, मज़हबी जज्बा़त में देखा गया।।’
डबवाली में कल जो हुआ, उसे भारतीय सभ्यता पर कलंक ही कहा जा सकता है। हम 21वीं सदी के प्राणी इतने आक्रामक कैसे हो सकते हैं। जो दीवारें दो समुदायों में खिंच रही हैं, उन्हें पाटेगा कौन? यह किसी ने सोचा है। हमारा देश विभिन्न धर्मों को मानने वाला है। हमारा एक पड़ोसी सिख है तो दूसरा डेरा प्रेमी। हरियाणा तो कभी भी धार्मिक उन्माद का गढ़ नहीं रहा। डेरा मुखी ने गुरू गोबिन्द सिंह जी का वेश धारण कर एक वर्ग विशेष को आहत किया मगर अब एक व्यक्ति के कार्य की सजा कितने लोग भुगतेंगे? कितने और शहीद होंगे? यह आग सिरसा से मुम्बई तक जा पहुंची है। इस आग में मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। इतनी धार्मिक असहिष्णुता! आखिर हम कहां जा रहे हैं? सविंधान ने हमें अपने-अपने ईष्ट की पूजा की इजाजत दी हुई है। मगर डेरा प्रेमियों को जब मालूम है कि माहौल में गर्माहट है तो ऐसी नामचर्चाएं कुछ दिनों के लिए स्थगित की जा सकती हैं और फिर किसी घर में हो रही नामचर्चा पर दूसरे वर्ग द्वारा हमले करने को भी कोई दुरस्त नहीं ठहराएगा। हमें धार्मिक सहिष्णुता व सब्र को बढ़ाना ही होगा। क्योकिं विध्वंसकारी तत्व तो ऐसे मौके के इंतजार में रहते हैं। जरा सी चिंगारी कब दावानल में बदल जाए, पता ही नहीं चलता। समाज के जिम्मेदार लोगों को ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए आगे आना होगा। हैरत की बात यह है कि बडे़-बड़े धार्मिक उपदेशक व उनके भक्त समय आने पर संयम दिखाने के बजाए धैर्य खोने लगते हैं। यह कैसे धर्म पनप रहे हैँ, जो हमें धैर्य की बजाए असहिष्णुता सिखा रहे हैं। गुरूनानक देव जी तो सदैव क्षमादान की बात करते रहे हैं। उनके शिष्यों को भी क्षमादान पर विचार करना होगा। अन्यथा तो मामला खिंचता ही चला जाएगा। डबवाली में पत्रकार चपेट में आए हैं तो कल को हम और आप भी इस आग में जल सकते हैं। क्योकिं गोली, आग और पानी पर किसी का पता नहीं लिखा होता। आमतौर पर देखा गया है कि हिंसा और दंगों की चपेट में बेकसूर ही आते हैं। इस पूरे प्रकरण में एक वर्ग विशेष का सरकार से विश्वास उठा हुआ है। इसी का परिणाम है कि भीड़ ने उपायुक्त को भी नहीं बक्शा। सबसे पहले तो सरकार को इस वर्ग में विश्वास जगाना होगा। सरकार को बताना होगा कि कानून सभी के लिए समान रोल अदा करेगा। जब तक सरकार का आचरण इस तरह इस तरह से नजर आएगा कि वह डेरा मुखी को अत्यधिक सुविधाएं दे रही हैं तो दूसरे पक्ष को बेबसी लगती है। बेबसी में मौका मिलने पर गुस्सा ज्यादा फूटता है। इसलिए राजा को मात्र दयावान ही नहीं होना चाहिए बल्कि दयावान दिखना भी चाहिए। सिख समुदाय को कानून पर भी विश्वास रखना चाहिए। डेरा मुखी के सभी मामले कोर्ट में है। हमें कानून हाथ में लेने की बजाए फैसले का इंतजार करना चाहिए। सरकार कोर्ट से आग्रह कर सकती है कि मामले को लम्बा न खींचा जाए। देश में राजनीति का पतन व गिरावट सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर हम देख रहे हैं मगर अभी भी न्यायपालिका देश को राह दिखा रही है। इसलिए अदालत को दूध का दूध और पानी का पानी करने दीजिए। किसी भी मसले का हल डंडे या गोली से नहीं निकला है। कश्मीर इसका जीता जागता उदाहरण है। डेरा प्रेमी भी मामले में ठण्ड पड़ने तक सामुहिक नामचर्चा स्थगित रखकर देशवासियों पर उपकार करे। डबवाली जैसी घटनाएं हमारे आसपास कहीं भी और कभी भी घट सकती है। इस पर क्या हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे? अगर हम ऐसा नहीं चाहते हैं तो हमें शरारती तत्वों के सिर उठने से पहले कानून व्यवस्था को सचेत करने की जिम्मेवारी भी निभानी होगी।
‘ज़ीस्त के रंग में ढलके देखो, अपना रुज़हान बदल के देखो।
कत्लो-गा़रत को भुला के लोगो, प्यार की राह पर चल के देखो,
कितना प्यारा है जहां उल्फत का, दहरे-ऩफरत से निकल के देखो।।’ -संपादक